Wednesday, November 4, 2009

विश्वामित्र अयोध्या में

भाग - ८ , विश्वामित्र अयोध्या में

परन्तु फिर केवल कुछ ही दिनों में दुःख छा गए
जैसे ही ऋषि विश्वामित्र अयोध्या आ गए

राजा दशरथ पुत्रो के साथ हंस गा रहे थे
तब जब ऋषि विश्वामित्र अयोध्या में आ रहे थे !!

माँ कैकयी की गोद में लेटे थे राम
महसूस कर रहे थे एक बार फिर स्वर्ग सा आराम !!

कुछ ही देर में महल में ऋषि जी आये
बोले कष्ट कर सुमंत जी, जरा दशरथ जी को बुलाये !!

सुमंत ने कहा दशरथ से , आपको ऋषिवर ने है बुलाया
दशरथ बोले तुम जाओ मैं अभी आया !!

जल का लोटा हाथ ले, राजा दशरथ पधारे राज भवन
जहा विश्वामित्र जी के आगमन से वातावरण हुआ था पावन !!

राजा दशरथ जभी धो रहे थे ऋषिवर के शुभ चरण
तभी उन्हें एक दिव्य कथा का होने लगा स्मरण !!

कथा की कैसे विश्वामित्र बन गए थे संत
और कैसे उनके मोह का हुआ था अंत !!

दशरथ बोले आपकी आज्ञा हो तो पुत्रो को भी बुलाऊ
और अपनी दिव्य वाणी का प्रेम व् आशीर्वाद उन्हें दिलवाऊ !!

ऋषिवर की आज्ञा पा चारो कुमार वहा आये
सबके प्रिय राम को देख ऋषिवर मन ही मन मुस्काए

फिर राजा दशरथ ने चारो के परिचय कराये
राम के स्वरुप में ऋषि को विष्णु नज़र आये !!

फिर राजा दशरथ से प्रसन्नता ज़ाहिर करी एक
की उनका पुत्र राम है तेजस्वी और नेक !!

और अपना दुखडा कह सुनाया
अपने अयोध्या आने का कारण बतलाया !!

जैसे ही हम दिव्य यज्ञ में आहुति डालते है
वैसे ही सुबाहु और मारीच राक्षस हमें ललकारते है !!

आकार वह इस यज्ञ में विघ्न हमेशा डालते है
इस कारण सब ऋषि यज्ञ सामग्री को सँभालते है !!

हम चाहते है की वह दोनों राक्षस न हमें तडपाये
तो क्या हम अपने यज्ञ की रक्षा के लिए राम को ले जाए !!

राजा दशरथ की सहर्ष आज्ञा पा राम - लक्ष्मण हुऐ तैयार
चल पड़े संग ऋषि विश्वामित्र के, छोड़ अपना परिवार !!

बालको की वापसी - भाग - ७

बालको की वापसी - भाग - ७

उस दिन अयोध्या में खूब खुशिया थी छाई
सुन पुत्रो के आने का समाचार, महारानियाँ फूली न समायी !!

अयोध्या पहुँच गए चारो कुमार, बहुत प्रसन्न थे राम
अयोध्यावासियों को स्वागत में देख कर करा उन्हें प्रणाम !!

इस ख़ुशी के अवसर पर मच गया हर तरफ शोर
महल में आते ही गए वह राज भवन की ओर !!

आते ही किया राजा दशरथ को प्रणाम
प्रसन्न चित हो बोले राजा आ गया मेरा राम !!

गए फिर मिलने तीनो रानियों से उनके बाल
बिन तुम्हारे कैसे बीते यह साल !!

तुम चारो हो बड़े ही प्यारे
हो तुम हमारी आँखों के तारे !!

सबमे मुझे राम है सबसे दुलारे
लेकिन तब भी हो लाडले मुझे तुम सारे !!

बस हर रात आते थे हमको ख्वाब तुम्हारे
अब कभी दूर न होने देंगे हम यह पुत्र न्यारे !!

बोली मताए पुत्रो से हे पुत्र वीरो
फिर हमें कभी छोड़ना मत, हमारे हीरो !!

चारो राजकुमार थे यकीनन बड़े वीर
पर माँ की ममता देख आँखों से बहने लगे नीर !!

गुरुकुल

गुरुकुल

कर रहे थे चारो राजकुमार गुरुकुल को प्रस्थान
सुमंत महा मंत्री ले जा रहे थे उनका सामान

तीनो माओं की आँखों से था जार-जार बह रहा नीर
राजा दशरथ रामभवन में हुऐ जा रहे थे अधीर !!

वहा आश्रम में गुरुमाता को भी था कुमारो का इन्तज़ार
आश्रम सीमा में उनके आगमन का मिलते ही समाचार !!

गुरुमाता गयी उन्हें लिवाने गुरुकुल के द्वार
और उनका स्वागत कर, दिया माँ का सा प्यार !!

क्युकी वह जानती थी की प्रिय राम हैं विष्णु अवतार
सो वह करने लगी नैनो से स्नेह, ममता की बौछार !!

आश्रम में कुमारो के आने से एक अलग महक थी छाई
पेड - पौधों, पशु - पक्षियों व् वन जीवो ने स्वागत में मधुर वीणा बजायी !!

प्रतिदिन गुरुकुल में गुरुमा ने उन्हें अपने हाथ से खाना खिलाया
और घर से दूर होने के दुःख से राजकुमारो को मुक्त कराया !!

गुरु से वेद ज्ञान पाते हुऐ बीते कई साल
और शिक्षा पाते हुए बड़े हुए सब बाल !!

बनकर ज्ञानवान युवक, सीख गए थे चारो करना परोपकार
तो स्वयं आई वह घडी जिसका अयोध्यावासी कर रहे थे इंतज़ार !!

चारो कुमार कर के गंगा पार
लौट आये अयोध्या, जहा सबको था उन्ही का इंतज़ार !!

अयोध्या में फिर एक बार आनंद छाया था
सबका लाडला राम बंधुओ सहित घर आया था !!

सीता जन्म - रामायण

सीता जन्म
भाग - 3

उधर मिथिला के खेतो में जहा किसान खुशाली लाते थे
आज वहीँ राजा जनक प्रजा की खुशहाली के लिए हल चलाते थे !!

कर रहे थे ऐसा वे, ले ऋषि का सुझाव नेक
जिसके अनुसार हल चला, पा सकते थे वह संतान एक

फिर धरती ने उगला सोना
चमक उठा धरती का हर कोना !!

बस तब तो था मिथिला में आनंद छाया
क्युकी राजा जनक ने एक कन्या को था पाया !!

वो तो थी धरती माँ की बेटी प्यारी
नाम रखा गया जिनका सीता सुकुमारी !!

जबसे पैदा हुई थी सिया रूप में लक्ष्मी अवतार
तबसे खुशिया मना रहा था मिथिला का हर परिवार !!

फिर पैदा हुई सीता की तीनो बहने, राज दुलारी
नाम थे जिनके उर्मिला, मांडवी और शुभकीर्ति कुमारी !!

एक बड़ा ही शुभवार आया था
मिथिला में उल्लास छाया था !!

पर वहा अयोध्या नगरी में
राजा दशरथ की राज नगरी में. !!

गुरुकुल - भाग - ३ - रामायण

भाग - ३ - गुरुकुल

हंसते - खेलते बीते कुछ वर्ष
अयोध्या में हर तरफ छाया था हर्ष !!

पर एक दिन, जब सब दरबार दिए गए खोल
तब ऋषि ने श्रीमुख ये सब दिया बोल !!

महारानियों, बड़े हो गए है चारो राजकुमार
बस अब एक दिन और लुटायीए इन पर अपना प्यार !!

क्युकी फिर जाना है इनको गंगा पार
जहा गुरुकुल को है इनका इंतज़ार !!

यह सुन तीनो रानिया गयी वही थम
कहने लगी ऋषि से , मत दीजिये हमें ऐसा गम !!

ऋषि बोले यह तो है बड़ी पुरानी रीति
कौशल्या माँ बोली , हाय ! यह कैसी है रीति !!

ऋषि ने कहा गुरुकुल से मिलता है सबको ज्ञान
ज्ञान पाकर ही बनते है साधारण मनुष्य विद्वान !!

गुरुकुल में होती है एक गुरुमाता
जिनका बच्चो से होता है माँ का ही नाता !!

दिव्य और अलौकिक होती है वहां की ज़मी
नहीं होती वहां कभी किसी चीज़ व् प्यार की कमी !!

गुरुकुल में बिताने है इन्हें बस कुछ ही साल
ताकि वेद ज्ञान पा, खुद को पहचान जाए ये बाल !!

मुझे इन्हें गुरुकुल ले जाने की दे इजाज़त
अन्यथा, मैं अपने कर्तव्य से हो जाऊंगा पराजत !!

रनिया बोली, हम नहीं करना चाहते आपका अपमान
परन्तु हमारे ये पुत्र तो हैं हमारी जान !!

हम अपने प्राणों को नहीं दूर भेजना चाहते
क्यों न आप इन्हें शिक्षा देने महल में ही आ जाते !!

ऋषि बोले मेरा महल में न पढाने का है एक कारण
यह नहीं है धर्म, इसलिए ताकि मैं करू धरम पालन !!

मुझे इन्हें अपने संग ले जाना है
और अपना धर्म निभाना है !!

महारानियों ! आप की बात होती है हमेशा सही
तो कहिये, मैं अपना धर्म निभाऊ या नहीं !!

महरनिया बोली, गुरुवर, अब हमारे पुत्र है आपकी संपत्ति
परन्तु केवल कुछ दिन दें हमें उन्हें यहाँ रखने की अनुमति !!

ऋषिवर धर्म-वश नहीं माने उनकी बात
तीनो मताए सोचे, हाय ! कैसे कटेगी यह रात !!

ऋषिवर वशिष्ठ ने अपनी बात जब दशरथ को बताई
बोले राजा, हाय ! यह कैसी घडी है आई ?

मुझे प्रिय हैं मेरे ये पुत्र सारे
यह चारो हैं दुनिया के सबसे न्यारे !!

जो पुत्र है मुझे प्राणों से भी प्यारे
अब दूर हो जायेंगे मेरी आँखों के तारे !!

जनम पश्चात् - भाग - २ ..-रामायण

भाग - २ - जनम पश्चात् ...

अयोध्या नरेश को हुऐ चार बालक
कौशल्या, सुमित्रा और कैकयी थी जिनकी पालक !!

ऋषियों - मुनियों ने मंत्रो का किया उच्चारण
और शुरू हुआ बालको का नाम-करण !!

कौशल्या नंदन का रखा गया नाम
जो की था पुरुषोत्तम राम !!

ऋषिवर बोले ' यह है बड़ा तेजस्विवान'
मंथरा को छोड़ हर चेहरे पर छा गयी मुस्कान !!

सुमत्रा को हुऐ थे दो बालक प्यारे
जो बने दशरथ की आँखों के तारे !!

ऋषि ने किया अपना आगे का काम
लक्ष्मण और शत्रुघ्न रखे उनके नाम !!

कैकयी पुत्र का रखा गया भरत नाम
प्रजा का भरण - पोषण निर्धारित हुआ उसका काम !!

ऋषि जी बोले, यह बनेंगे विद्वान
अब मंथरा के चेहरे पर भी छाई मुस्कान !!

भरत और राम का वर्ण था श्याम
और सबके लाडले बने श्री राम !!

रामायण -जन्म पूर्व -बाल कांड

बाल कांड
जनम पूर्व
भाग - १


राजा दशरथ थे चिंता में लेटे
सोच रहे थे मेरे नहीं हैं बेटे !!

वह थे चिंता से बिलकुल मौन
' मेरे बाद अयोध्या पती बनेगा कौन' !

एक दिन आये ऋषि वशिष्ठ और सुझाव दिया एक
दूर गुफा में हैं ऋषि ऋंगी बड़े ही नेक !

उनसे करवाओ तुम पुत्रयेष्टि यज्ञ
ताकि अयोध्या की कीर्ति हो जाये सर्वज्ञ !!

कुछ समय पश्चात् झूम उठी अयोध्या सारी,
और खिल गयी ढेरो फूलो की क्यारी !!

राजन की थी तीन बीबिया प्यारी
कौशल्या, सुमित्रा और कैकयी सबसे दुलारी !!

फलीभूत हुआ दिव्य यज्ञ जब
अयोध्या में खुशिया सर्वज्ञ हुई तब !!

खुशियों की छा गयी बहार
देवो ने गाए मंगल चार !!

उस दिन था बड़ा ही शुभवार
जब जन्म लिए विष्णु अवतार !!