Sunday, November 8, 2009

अहिल्या माँ की कथा और मोक्ष प्राप्ति

अहिल्या माँ की कथा और मोक्ष प्राप्ति

कुछ वर्ष पहले यहाँ रहते थे गौतम ऋषि
उनकी भार्या अहिल्या सदा देती थी उन्हें ख़ुशी

अहिल्या, सौन्दर्य की देवी, करती थी सोलह श्रृंगार
उनकी अनुपम सुन्दरता थी ऋषि गौतम को उपहार !!

एक प्रातः ऋषि गए स्नान करने जब गंगा की ओर
अपनी पतिव्रता भार्या को कुटिया में अकेला छोड़ !!

तब वायु मार्ग से गुज़र रहे थे इन्द्र भगवान
और अति सुन्दर अहिल्या देवी पर गया ध्यान !!

सुंदर देवी देख हो गए उन पर मुग्ध
और उन्हें पाने का वह करने लगे कुछ युक्त !!

इन्द्र देव ने धारण करा ऋषि गौतम का रूप
क्युकी उन्हें था भा गया अहिल्या जी का स्वरुप !!

जैसे ही सूरज को ढकते बादल छा गए
वैसे ही इन्द्र देव गौतम ऋषि का रूप धर आश्रम में आ गए !!

आते ही वह अहिल्या देवी से करने लगे बात
और प्रकृति की छटा निहारने लगे वह बैठ एक साथ !!

अहिल्या माँ बैठी थी फैलाये अपने केश
और तभी हुआ ऋषि गौतम का आश्रम में प्रवेश !!

जब ऋषि ने अहिल्या जी को किसी और संग पाया
गुस्से से भड़के और बोले ' दुष्ट कौन है तू और यहाँ कैसे आया ' !!

दो - दो ऋषि स्वामी देख कर अहिल्या को अनिष्ट ने सताया
आश्चर्ये में वह पड़ गयी , कौन है अपना, कौन पराया !!

क्षमा मांगने के लिए इन्द्र ने अपना रूप किया धारण
पर ऋषि गौतम ने दे दिया श्राप बिना सुने ही कारण !!

माँ अहिल्या को श्राप दिया, बन जाए वह पाषाण
शिला बन गयी देवी अहिल्या, हर तरफ आ गया तूफ़ान !!

जब से अहिल्या माँ थी शिला बन गयी
तब से यहाँ की भूमि थी सूनी हो गयी !!

इस कथा का विश्वामित्र ने श्रवण कराया
और अहिल्या माँ का पाषाण रूप राम को था दिखाया !!

ऋषि बोले, जाओ राम, शिला को श्री चरण अपने लगाओ
और देवी अहिल्या को कटु श्राप से तुंरत मुक्त कराओ !!

सुन यह बात श्री राम ने अपना कदम बढाया
और शिला रूप अहिल्या पर अपना चरण लगाया !!

ऐसा करते ही श्राप मुक्त हुई अहिल्या माता
मानने लगी श्री राम को वह अपना भाग्य विधाता !!

Friday, November 6, 2009

मिथिला की तैय्यारी

मिथिला की तैय्यारी

सभी राक्षसो को मार कर प्रसन्न थे दोनो कुमार
रात्री मे निश्चित हो सोये सब ऋषि और राजकुमार !!

प्रातः हुई तो उठे वे लेकर प्रभू का नाम
घर जाने का सोच कर बडे खुश थे राम !!

उठ कर के करने लगे दोनो ऋषि की सेवा
श्रद्धा भाव से बोले, राम, ऋषि आपमे दिखते है हमे कयी देवता !!

तत्पश्चात आज्ञा मांगी क्या हम अब लौटें अपने घर
ऋषि बोले क्या जल्दी है, हमे निहारने दे आप जी भर !!

तभी मिथिला नगरी से ऋषि वर को संदेशा आया
राजा जनक ने सीता स्वयंवर मे था सादर उन्हे बुलाया !!

ऋषि ने फिर कुमारो को शिव धनुष का था बताया
बोले वह है इतना भारी, उसे कोई नही है उठा पाया !!

राम-लखन को साथ ले ऋषि चले मिथिला की ओर
मार्ग मे मिले उन्हे कयी सुंदर सुंदर मोर !!

बार बार ऋषि विश्वामित्र देते थे राम को बधाई
मार्ग मे ऋषि ने उन्हे समुद्र मंथन की थी कथा सुनाई !!

गंगा किनारे राम लखन को दी कुटी एक दिखाई
ऋषि ने विस्तार से उन्हे उसकी कथा सुनाई !!

आगे क्या होगा, जानने से पेहले लो एक नाम
जोर से मिलकर सारे बोलो जय जय श्री राम !!

सीता स्वयंवर की तैयारिया

सीता स्वयंवर की तैयारिया

उधर मिथिला नगरी मे
राजा जनक की राज नगरी मे

सयानी हो गयी थी चारो बहने
वह तो थी जैसे मिथिला के गहने

राजा जनक ने अपने मन मे किया कुछ विचार
कुछ दिवस बाद ही आयेगा बहुत ही शुभवार !!

बडी हो गयी है मेरी प्रिये सुपुत्री सीता
तो उस दिन मै क्यू न उसका विवाह ही कर देता !!

पर सिया राजकुमारी का विवाह किसी वीर कुवर से करुंगा
और सबसे बलशाली चुनने को स्वयंवर मै रचुंगा !!

मै महमांनो को शिव धनुष उठाने को बोलुंगा
और फिर उस पर प्रत्यंचा भी चढाने को कहुंगा !!

जो होगा इसमे सफल मेरी पुत्री विवाह उसी से करेगी
और अपने वीर पती संग सुखी जीवन भर वह रहेगी !!

यह सोच जनक ने विभिन्न राज्यो को भेजा समाचार
और लगे वे सोचने, आयेंगे कयी वीर राजकुमार !!

सिया स्वयंवर की खबर सुन तीनो बहने फुली ना समाई
जान यह समाचार सिया कुमारी भी शर्मायी !!

यज्ञ पूर्ती

यज्ञ पूर्ती - १

राज कुमारो ने ऋषि संग वन में रात बितायी
अगले दिन प्रातः ऋषि ने उन्हें अस्त्र विद्या सिखलाई !!

तत्पश्चात वे राजकुमारों को अपने आश्रम में ले आये
कुछ दिन राम-लखन ने ऋषि आश्रम की रक्षा में बिताये !!

सुबाहु और मारीच जिन्हें विश्वामित्र सदा ही सहते थे
वह दोनों दैत्य ऋषि आश्रम के समीप ही रहते थे !!

राम-लखन ने थे बड़े ही नेक कर्म किये
सो ऋषि मुनियों ने उन्हें ढेरो आशीष दिए !!

अगले दिन प्रातः पुनः हवन सामग्री लायी गयी
और मंत्रोच्चारण के बीच शुभ अग्नि जलाई गयी !!

परन्तु यह क्या ? आश्रम में हर तरफ अँधेरा छा गया
सुबाहु, मारीच संग दैत्य सेना लिए आ गया !!

जैसे ही तपस्या ऋषियों ने प्रारंभ करी
दैत्य सेना रक्त की नदिया बहाने लपट पड़ी !!

उन्होंने गर यज्ञ में विघ्न डालनी चाही थी
तो यज्ञ रक्षा करने की प्रभू राम ने भी तो कसम खायी थी !!

दिव्य अग्नि में गाय शीर्ष गिराने दैत्य मारीच आया
क्रोध में आकर श्री राम ने मानव अस्त्र चलाया !!

मानव अस्त्र के लगते ही उसका बुरा विचार मिट गया
और वह दूर समुद्र तट पे जा गिर गया !!

फिर प्रभू राम ने सुबाहु पर किया प्रहार
आग्नेय अस्त्र की मदद से राम ने सब मार गिराए !!

यज्ञ में विघ्न डालने अन्य दैत्य जब आये
वायव्य अस्त्र की मदद से राम ने सब मार गिराए !!

सम्पूर्ण हुआ वह दिव्य यज्ञ और
श्री राम की कीर्ति हुई आश्रम में सर्वज्ञ !!

विश्वामित्र ने राम जी को दी बधाई
की उन्होंने ऋषियों की नैया पार लगायी !!

ऋषिवर ने पूछा राम से मांगो क्या वरदान तुम्हे चाहिए
राम आदर से बोले कृपया आप मेरे गुरु बन स्वयं ही बताइए !!

दोनों भाइयो से प्रसन्न हो ऋषि ने दिया उन्हें वरदान
खली न होगा तुम्हारा तरकश, ख़त्म ना होंगे तुम्हारे बाण !!

अभिभूत होकर राम-लखन ने लिया गुरु का आशीर्वाद
यज्ञ अग्नि को प्रणाम कर दोनों ने पिया यज्ञ प्रसाद !!

Wednesday, November 4, 2009

ताड़का वध

ताड़का वध

मार्ग में ऋषि ने राम को युद्घ विद्या समझाई
चलते हुऐ मार्ग में फिर सरयू नगरी आई !!

सरयू नगरी थी हमेशा से ही बहुत वीरान
रहती थी वहा ताड़का, करती सबको परेशान !!

ताड़का जो थी मायावी राक्षस मारीच की माता
उसे ना था कोई दिव्य कर्म, यज्ञ आदि भाता !!

जब ऋषिवर ने राम को ताड़का के कुकर्म का परिचय करवाया
तो तुंरत ही ताड़का वध का राम ने संकल्प उठाया !!

श्री राम की धनुष टंकार से मच गया हर तरफ शोर
भड़क उठी राख्श्सी ताड़का और युद्घ हुआ घनघोर !!

राम ने थी ताड़का पर जल्दी ही विजय पाई
इस पर ऋषि विश्वामित्र ने दी उन्हें बधाई !!

प्रभु राम के दिव्य अस्त्रों से होता है जिसका भी संहार
पा लेता वह मोक्ष, निश्चित है उसका उदगार !!

विश्वामित्र अयोध्या में

भाग - ८ , विश्वामित्र अयोध्या में

परन्तु फिर केवल कुछ ही दिनों में दुःख छा गए
जैसे ही ऋषि विश्वामित्र अयोध्या आ गए

राजा दशरथ पुत्रो के साथ हंस गा रहे थे
तब जब ऋषि विश्वामित्र अयोध्या में आ रहे थे !!

माँ कैकयी की गोद में लेटे थे राम
महसूस कर रहे थे एक बार फिर स्वर्ग सा आराम !!

कुछ ही देर में महल में ऋषि जी आये
बोले कष्ट कर सुमंत जी, जरा दशरथ जी को बुलाये !!

सुमंत ने कहा दशरथ से , आपको ऋषिवर ने है बुलाया
दशरथ बोले तुम जाओ मैं अभी आया !!

जल का लोटा हाथ ले, राजा दशरथ पधारे राज भवन
जहा विश्वामित्र जी के आगमन से वातावरण हुआ था पावन !!

राजा दशरथ जभी धो रहे थे ऋषिवर के शुभ चरण
तभी उन्हें एक दिव्य कथा का होने लगा स्मरण !!

कथा की कैसे विश्वामित्र बन गए थे संत
और कैसे उनके मोह का हुआ था अंत !!

दशरथ बोले आपकी आज्ञा हो तो पुत्रो को भी बुलाऊ
और अपनी दिव्य वाणी का प्रेम व् आशीर्वाद उन्हें दिलवाऊ !!

ऋषिवर की आज्ञा पा चारो कुमार वहा आये
सबके प्रिय राम को देख ऋषिवर मन ही मन मुस्काए

फिर राजा दशरथ ने चारो के परिचय कराये
राम के स्वरुप में ऋषि को विष्णु नज़र आये !!

फिर राजा दशरथ से प्रसन्नता ज़ाहिर करी एक
की उनका पुत्र राम है तेजस्वी और नेक !!

और अपना दुखडा कह सुनाया
अपने अयोध्या आने का कारण बतलाया !!

जैसे ही हम दिव्य यज्ञ में आहुति डालते है
वैसे ही सुबाहु और मारीच राक्षस हमें ललकारते है !!

आकार वह इस यज्ञ में विघ्न हमेशा डालते है
इस कारण सब ऋषि यज्ञ सामग्री को सँभालते है !!

हम चाहते है की वह दोनों राक्षस न हमें तडपाये
तो क्या हम अपने यज्ञ की रक्षा के लिए राम को ले जाए !!

राजा दशरथ की सहर्ष आज्ञा पा राम - लक्ष्मण हुऐ तैयार
चल पड़े संग ऋषि विश्वामित्र के, छोड़ अपना परिवार !!

बालको की वापसी - भाग - ७

बालको की वापसी - भाग - ७

उस दिन अयोध्या में खूब खुशिया थी छाई
सुन पुत्रो के आने का समाचार, महारानियाँ फूली न समायी !!

अयोध्या पहुँच गए चारो कुमार, बहुत प्रसन्न थे राम
अयोध्यावासियों को स्वागत में देख कर करा उन्हें प्रणाम !!

इस ख़ुशी के अवसर पर मच गया हर तरफ शोर
महल में आते ही गए वह राज भवन की ओर !!

आते ही किया राजा दशरथ को प्रणाम
प्रसन्न चित हो बोले राजा आ गया मेरा राम !!

गए फिर मिलने तीनो रानियों से उनके बाल
बिन तुम्हारे कैसे बीते यह साल !!

तुम चारो हो बड़े ही प्यारे
हो तुम हमारी आँखों के तारे !!

सबमे मुझे राम है सबसे दुलारे
लेकिन तब भी हो लाडले मुझे तुम सारे !!

बस हर रात आते थे हमको ख्वाब तुम्हारे
अब कभी दूर न होने देंगे हम यह पुत्र न्यारे !!

बोली मताए पुत्रो से हे पुत्र वीरो
फिर हमें कभी छोड़ना मत, हमारे हीरो !!

चारो राजकुमार थे यकीनन बड़े वीर
पर माँ की ममता देख आँखों से बहने लगे नीर !!