यज्ञ पूर्ती - १
राज कुमारो ने ऋषि संग वन में रात बितायी
अगले दिन प्रातः ऋषि ने उन्हें अस्त्र विद्या सिखलाई !!
तत्पश्चात वे राजकुमारों को अपने आश्रम में ले आये
कुछ दिन राम-लखन ने ऋषि आश्रम की रक्षा में बिताये !!
सुबाहु और मारीच जिन्हें विश्वामित्र सदा ही सहते थे
वह दोनों दैत्य ऋषि आश्रम के समीप ही रहते थे !!
राम-लखन ने थे बड़े ही नेक कर्म किये
सो ऋषि मुनियों ने उन्हें ढेरो आशीष दिए !!
अगले दिन प्रातः पुनः हवन सामग्री लायी गयी
और मंत्रोच्चारण के बीच शुभ अग्नि जलाई गयी !!
परन्तु यह क्या ? आश्रम में हर तरफ अँधेरा छा गया
सुबाहु, मारीच संग दैत्य सेना लिए आ गया !!
जैसे ही तपस्या ऋषियों ने प्रारंभ करी
दैत्य सेना रक्त की नदिया बहाने लपट पड़ी !!
उन्होंने गर यज्ञ में विघ्न डालनी चाही थी
तो यज्ञ रक्षा करने की प्रभू राम ने भी तो कसम खायी थी !!
दिव्य अग्नि में गाय शीर्ष गिराने दैत्य मारीच आया
क्रोध में आकर श्री राम ने मानव अस्त्र चलाया !!
मानव अस्त्र के लगते ही उसका बुरा विचार मिट गया
और वह दूर समुद्र तट पे जा गिर गया !!
फिर प्रभू राम ने सुबाहु पर किया प्रहार
आग्नेय अस्त्र की मदद से राम ने सब मार गिराए !!
यज्ञ में विघ्न डालने अन्य दैत्य जब आये
वायव्य अस्त्र की मदद से राम ने सब मार गिराए !!
सम्पूर्ण हुआ वह दिव्य यज्ञ और
श्री राम की कीर्ति हुई आश्रम में सर्वज्ञ !!
विश्वामित्र ने राम जी को दी बधाई
की उन्होंने ऋषियों की नैया पार लगायी !!
ऋषिवर ने पूछा राम से मांगो क्या वरदान तुम्हे चाहिए
राम आदर से बोले कृपया आप मेरे गुरु बन स्वयं ही बताइए !!
दोनों भाइयो से प्रसन्न हो ऋषि ने दिया उन्हें वरदान
खली न होगा तुम्हारा तरकश, ख़त्म ना होंगे तुम्हारे बाण !!
अभिभूत होकर राम-लखन ने लिया गुरु का आशीर्वाद
यज्ञ अग्नि को प्रणाम कर दोनों ने पिया यज्ञ प्रसाद !!
I am Raghav Sharma, a student of Class VI. I study in St. Anthony Secondary School Sector 9 Faridabad. I love to paint, write poems and novels. I have been publishing a childrens' magazine in my summer vacations for last two years. I love to talk and read new books.
Friday, November 6, 2009
Wednesday, November 4, 2009
ताड़का वध
ताड़का वध
मार्ग में ऋषि ने राम को युद्घ विद्या समझाई
चलते हुऐ मार्ग में फिर सरयू नगरी आई !!
सरयू नगरी थी हमेशा से ही बहुत वीरान
रहती थी वहा ताड़का, करती सबको परेशान !!
ताड़का जो थी मायावी राक्षस मारीच की माता
उसे ना था कोई दिव्य कर्म, यज्ञ आदि भाता !!
जब ऋषिवर ने राम को ताड़का के कुकर्म का परिचय करवाया
तो तुंरत ही ताड़का वध का राम ने संकल्प उठाया !!
श्री राम की धनुष टंकार से मच गया हर तरफ शोर
भड़क उठी राख्श्सी ताड़का और युद्घ हुआ घनघोर !!
राम ने थी ताड़का पर जल्दी ही विजय पाई
इस पर ऋषि विश्वामित्र ने दी उन्हें बधाई !!
प्रभु राम के दिव्य अस्त्रों से होता है जिसका भी संहार
पा लेता वह मोक्ष, निश्चित है उसका उदगार !!
मार्ग में ऋषि ने राम को युद्घ विद्या समझाई
चलते हुऐ मार्ग में फिर सरयू नगरी आई !!
सरयू नगरी थी हमेशा से ही बहुत वीरान
रहती थी वहा ताड़का, करती सबको परेशान !!
ताड़का जो थी मायावी राक्षस मारीच की माता
उसे ना था कोई दिव्य कर्म, यज्ञ आदि भाता !!
जब ऋषिवर ने राम को ताड़का के कुकर्म का परिचय करवाया
तो तुंरत ही ताड़का वध का राम ने संकल्प उठाया !!
श्री राम की धनुष टंकार से मच गया हर तरफ शोर
भड़क उठी राख्श्सी ताड़का और युद्घ हुआ घनघोर !!
राम ने थी ताड़का पर जल्दी ही विजय पाई
इस पर ऋषि विश्वामित्र ने दी उन्हें बधाई !!
प्रभु राम के दिव्य अस्त्रों से होता है जिसका भी संहार
पा लेता वह मोक्ष, निश्चित है उसका उदगार !!
विश्वामित्र अयोध्या में
भाग - ८ , विश्वामित्र अयोध्या में
परन्तु फिर केवल कुछ ही दिनों में दुःख छा गए
जैसे ही ऋषि विश्वामित्र अयोध्या आ गए
राजा दशरथ पुत्रो के साथ हंस गा रहे थे
तब जब ऋषि विश्वामित्र अयोध्या में आ रहे थे !!
माँ कैकयी की गोद में लेटे थे राम
महसूस कर रहे थे एक बार फिर स्वर्ग सा आराम !!
कुछ ही देर में महल में ऋषि जी आये
बोले कष्ट कर सुमंत जी, जरा दशरथ जी को बुलाये !!
सुमंत ने कहा दशरथ से , आपको ऋषिवर ने है बुलाया
दशरथ बोले तुम जाओ मैं अभी आया !!
जल का लोटा हाथ ले, राजा दशरथ पधारे राज भवन
जहा विश्वामित्र जी के आगमन से वातावरण हुआ था पावन !!
राजा दशरथ जभी धो रहे थे ऋषिवर के शुभ चरण
तभी उन्हें एक दिव्य कथा का होने लगा स्मरण !!
कथा की कैसे विश्वामित्र बन गए थे संत
और कैसे उनके मोह का हुआ था अंत !!
दशरथ बोले आपकी आज्ञा हो तो पुत्रो को भी बुलाऊ
और अपनी दिव्य वाणी का प्रेम व् आशीर्वाद उन्हें दिलवाऊ !!
ऋषिवर की आज्ञा पा चारो कुमार वहा आये
सबके प्रिय राम को देख ऋषिवर मन ही मन मुस्काए
फिर राजा दशरथ ने चारो के परिचय कराये
राम के स्वरुप में ऋषि को विष्णु नज़र आये !!
फिर राजा दशरथ से प्रसन्नता ज़ाहिर करी एक
की उनका पुत्र राम है तेजस्वी और नेक !!
और अपना दुखडा कह सुनाया
अपने अयोध्या आने का कारण बतलाया !!
जैसे ही हम दिव्य यज्ञ में आहुति डालते है
वैसे ही सुबाहु और मारीच राक्षस हमें ललकारते है !!
आकार वह इस यज्ञ में विघ्न हमेशा डालते है
इस कारण सब ऋषि यज्ञ सामग्री को सँभालते है !!
हम चाहते है की वह दोनों राक्षस न हमें तडपाये
तो क्या हम अपने यज्ञ की रक्षा के लिए राम को ले जाए !!
राजा दशरथ की सहर्ष आज्ञा पा राम - लक्ष्मण हुऐ तैयार
चल पड़े संग ऋषि विश्वामित्र के, छोड़ अपना परिवार !!
परन्तु फिर केवल कुछ ही दिनों में दुःख छा गए
जैसे ही ऋषि विश्वामित्र अयोध्या आ गए
राजा दशरथ पुत्रो के साथ हंस गा रहे थे
तब जब ऋषि विश्वामित्र अयोध्या में आ रहे थे !!
माँ कैकयी की गोद में लेटे थे राम
महसूस कर रहे थे एक बार फिर स्वर्ग सा आराम !!
कुछ ही देर में महल में ऋषि जी आये
बोले कष्ट कर सुमंत जी, जरा दशरथ जी को बुलाये !!
सुमंत ने कहा दशरथ से , आपको ऋषिवर ने है बुलाया
दशरथ बोले तुम जाओ मैं अभी आया !!
जल का लोटा हाथ ले, राजा दशरथ पधारे राज भवन
जहा विश्वामित्र जी के आगमन से वातावरण हुआ था पावन !!
राजा दशरथ जभी धो रहे थे ऋषिवर के शुभ चरण
तभी उन्हें एक दिव्य कथा का होने लगा स्मरण !!
कथा की कैसे विश्वामित्र बन गए थे संत
और कैसे उनके मोह का हुआ था अंत !!
दशरथ बोले आपकी आज्ञा हो तो पुत्रो को भी बुलाऊ
और अपनी दिव्य वाणी का प्रेम व् आशीर्वाद उन्हें दिलवाऊ !!
ऋषिवर की आज्ञा पा चारो कुमार वहा आये
सबके प्रिय राम को देख ऋषिवर मन ही मन मुस्काए
फिर राजा दशरथ ने चारो के परिचय कराये
राम के स्वरुप में ऋषि को विष्णु नज़र आये !!
फिर राजा दशरथ से प्रसन्नता ज़ाहिर करी एक
की उनका पुत्र राम है तेजस्वी और नेक !!
और अपना दुखडा कह सुनाया
अपने अयोध्या आने का कारण बतलाया !!
जैसे ही हम दिव्य यज्ञ में आहुति डालते है
वैसे ही सुबाहु और मारीच राक्षस हमें ललकारते है !!
आकार वह इस यज्ञ में विघ्न हमेशा डालते है
इस कारण सब ऋषि यज्ञ सामग्री को सँभालते है !!
हम चाहते है की वह दोनों राक्षस न हमें तडपाये
तो क्या हम अपने यज्ञ की रक्षा के लिए राम को ले जाए !!
राजा दशरथ की सहर्ष आज्ञा पा राम - लक्ष्मण हुऐ तैयार
चल पड़े संग ऋषि विश्वामित्र के, छोड़ अपना परिवार !!
बालको की वापसी - भाग - ७
बालको की वापसी - भाग - ७
उस दिन अयोध्या में खूब खुशिया थी छाई
सुन पुत्रो के आने का समाचार, महारानियाँ फूली न समायी !!
अयोध्या पहुँच गए चारो कुमार, बहुत प्रसन्न थे राम
अयोध्यावासियों को स्वागत में देख कर करा उन्हें प्रणाम !!
इस ख़ुशी के अवसर पर मच गया हर तरफ शोर
महल में आते ही गए वह राज भवन की ओर !!
आते ही किया राजा दशरथ को प्रणाम
प्रसन्न चित हो बोले राजा आ गया मेरा राम !!
गए फिर मिलने तीनो रानियों से उनके बाल
बिन तुम्हारे कैसे बीते यह साल !!
तुम चारो हो बड़े ही प्यारे
हो तुम हमारी आँखों के तारे !!
सबमे मुझे राम है सबसे दुलारे
लेकिन तब भी हो लाडले मुझे तुम सारे !!
बस हर रात आते थे हमको ख्वाब तुम्हारे
अब कभी दूर न होने देंगे हम यह पुत्र न्यारे !!
बोली मताए पुत्रो से हे पुत्र वीरो
फिर हमें कभी छोड़ना मत, हमारे हीरो !!
चारो राजकुमार थे यकीनन बड़े वीर
पर माँ की ममता देख आँखों से बहने लगे नीर !!
उस दिन अयोध्या में खूब खुशिया थी छाई
सुन पुत्रो के आने का समाचार, महारानियाँ फूली न समायी !!
अयोध्या पहुँच गए चारो कुमार, बहुत प्रसन्न थे राम
अयोध्यावासियों को स्वागत में देख कर करा उन्हें प्रणाम !!
इस ख़ुशी के अवसर पर मच गया हर तरफ शोर
महल में आते ही गए वह राज भवन की ओर !!
आते ही किया राजा दशरथ को प्रणाम
प्रसन्न चित हो बोले राजा आ गया मेरा राम !!
गए फिर मिलने तीनो रानियों से उनके बाल
बिन तुम्हारे कैसे बीते यह साल !!
तुम चारो हो बड़े ही प्यारे
हो तुम हमारी आँखों के तारे !!
सबमे मुझे राम है सबसे दुलारे
लेकिन तब भी हो लाडले मुझे तुम सारे !!
बस हर रात आते थे हमको ख्वाब तुम्हारे
अब कभी दूर न होने देंगे हम यह पुत्र न्यारे !!
बोली मताए पुत्रो से हे पुत्र वीरो
फिर हमें कभी छोड़ना मत, हमारे हीरो !!
चारो राजकुमार थे यकीनन बड़े वीर
पर माँ की ममता देख आँखों से बहने लगे नीर !!
गुरुकुल
गुरुकुल
कर रहे थे चारो राजकुमार गुरुकुल को प्रस्थान
सुमंत महा मंत्री ले जा रहे थे उनका सामान
तीनो माओं की आँखों से था जार-जार बह रहा नीर
राजा दशरथ रामभवन में हुऐ जा रहे थे अधीर !!
वहा आश्रम में गुरुमाता को भी था कुमारो का इन्तज़ार
आश्रम सीमा में उनके आगमन का मिलते ही समाचार !!
गुरुमाता गयी उन्हें लिवाने गुरुकुल के द्वार
और उनका स्वागत कर, दिया माँ का सा प्यार !!
क्युकी वह जानती थी की प्रिय राम हैं विष्णु अवतार
सो वह करने लगी नैनो से स्नेह, ममता की बौछार !!
आश्रम में कुमारो के आने से एक अलग महक थी छाई
पेड - पौधों, पशु - पक्षियों व् वन जीवो ने स्वागत में मधुर वीणा बजायी !!
प्रतिदिन गुरुकुल में गुरुमा ने उन्हें अपने हाथ से खाना खिलाया
और घर से दूर होने के दुःख से राजकुमारो को मुक्त कराया !!
गुरु से वेद ज्ञान पाते हुऐ बीते कई साल
और शिक्षा पाते हुए बड़े हुए सब बाल !!
बनकर ज्ञानवान युवक, सीख गए थे चारो करना परोपकार
तो स्वयं आई वह घडी जिसका अयोध्यावासी कर रहे थे इंतज़ार !!
चारो कुमार कर के गंगा पार
लौट आये अयोध्या, जहा सबको था उन्ही का इंतज़ार !!
अयोध्या में फिर एक बार आनंद छाया था
सबका लाडला राम बंधुओ सहित घर आया था !!
कर रहे थे चारो राजकुमार गुरुकुल को प्रस्थान
सुमंत महा मंत्री ले जा रहे थे उनका सामान
तीनो माओं की आँखों से था जार-जार बह रहा नीर
राजा दशरथ रामभवन में हुऐ जा रहे थे अधीर !!
वहा आश्रम में गुरुमाता को भी था कुमारो का इन्तज़ार
आश्रम सीमा में उनके आगमन का मिलते ही समाचार !!
गुरुमाता गयी उन्हें लिवाने गुरुकुल के द्वार
और उनका स्वागत कर, दिया माँ का सा प्यार !!
क्युकी वह जानती थी की प्रिय राम हैं विष्णु अवतार
सो वह करने लगी नैनो से स्नेह, ममता की बौछार !!
आश्रम में कुमारो के आने से एक अलग महक थी छाई
पेड - पौधों, पशु - पक्षियों व् वन जीवो ने स्वागत में मधुर वीणा बजायी !!
प्रतिदिन गुरुकुल में गुरुमा ने उन्हें अपने हाथ से खाना खिलाया
और घर से दूर होने के दुःख से राजकुमारो को मुक्त कराया !!
गुरु से वेद ज्ञान पाते हुऐ बीते कई साल
और शिक्षा पाते हुए बड़े हुए सब बाल !!
बनकर ज्ञानवान युवक, सीख गए थे चारो करना परोपकार
तो स्वयं आई वह घडी जिसका अयोध्यावासी कर रहे थे इंतज़ार !!
चारो कुमार कर के गंगा पार
लौट आये अयोध्या, जहा सबको था उन्ही का इंतज़ार !!
अयोध्या में फिर एक बार आनंद छाया था
सबका लाडला राम बंधुओ सहित घर आया था !!
सीता जन्म - रामायण
सीता जन्म
भाग - 3
उधर मिथिला के खेतो में जहा किसान खुशाली लाते थे
आज वहीँ राजा जनक प्रजा की खुशहाली के लिए हल चलाते थे !!
कर रहे थे ऐसा वे, ले ऋषि का सुझाव नेक
जिसके अनुसार हल चला, पा सकते थे वह संतान एक
फिर धरती ने उगला सोना
चमक उठा धरती का हर कोना !!
बस तब तो था मिथिला में आनंद छाया
क्युकी राजा जनक ने एक कन्या को था पाया !!
वो तो थी धरती माँ की बेटी प्यारी
नाम रखा गया जिनका सीता सुकुमारी !!
जबसे पैदा हुई थी सिया रूप में लक्ष्मी अवतार
तबसे खुशिया मना रहा था मिथिला का हर परिवार !!
फिर पैदा हुई सीता की तीनो बहने, राज दुलारी
नाम थे जिनके उर्मिला, मांडवी और शुभकीर्ति कुमारी !!
एक बड़ा ही शुभवार आया था
मिथिला में उल्लास छाया था !!
पर वहा अयोध्या नगरी में
राजा दशरथ की राज नगरी में. !!
भाग - 3
उधर मिथिला के खेतो में जहा किसान खुशाली लाते थे
आज वहीँ राजा जनक प्रजा की खुशहाली के लिए हल चलाते थे !!
कर रहे थे ऐसा वे, ले ऋषि का सुझाव नेक
जिसके अनुसार हल चला, पा सकते थे वह संतान एक
फिर धरती ने उगला सोना
चमक उठा धरती का हर कोना !!
बस तब तो था मिथिला में आनंद छाया
क्युकी राजा जनक ने एक कन्या को था पाया !!
वो तो थी धरती माँ की बेटी प्यारी
नाम रखा गया जिनका सीता सुकुमारी !!
जबसे पैदा हुई थी सिया रूप में लक्ष्मी अवतार
तबसे खुशिया मना रहा था मिथिला का हर परिवार !!
फिर पैदा हुई सीता की तीनो बहने, राज दुलारी
नाम थे जिनके उर्मिला, मांडवी और शुभकीर्ति कुमारी !!
एक बड़ा ही शुभवार आया था
मिथिला में उल्लास छाया था !!
पर वहा अयोध्या नगरी में
राजा दशरथ की राज नगरी में. !!
गुरुकुल - भाग - ३ - रामायण
भाग - ३ - गुरुकुल
हंसते - खेलते बीते कुछ वर्ष
अयोध्या में हर तरफ छाया था हर्ष !!
पर एक दिन, जब सब दरबार दिए गए खोल
तब ऋषि ने श्रीमुख ये सब दिया बोल !!
महारानियों, बड़े हो गए है चारो राजकुमार
बस अब एक दिन और लुटायीए इन पर अपना प्यार !!
क्युकी फिर जाना है इनको गंगा पार
जहा गुरुकुल को है इनका इंतज़ार !!
यह सुन तीनो रानिया गयी वही थम
कहने लगी ऋषि से , मत दीजिये हमें ऐसा गम !!
ऋषि बोले यह तो है बड़ी पुरानी रीति
कौशल्या माँ बोली , हाय ! यह कैसी है रीति !!
ऋषि ने कहा गुरुकुल से मिलता है सबको ज्ञान
ज्ञान पाकर ही बनते है साधारण मनुष्य विद्वान !!
गुरुकुल में होती है एक गुरुमाता
जिनका बच्चो से होता है माँ का ही नाता !!
दिव्य और अलौकिक होती है वहां की ज़मी
नहीं होती वहां कभी किसी चीज़ व् प्यार की कमी !!
गुरुकुल में बिताने है इन्हें बस कुछ ही साल
ताकि वेद ज्ञान पा, खुद को पहचान जाए ये बाल !!
मुझे इन्हें गुरुकुल ले जाने की दे इजाज़त
अन्यथा, मैं अपने कर्तव्य से हो जाऊंगा पराजत !!
रनिया बोली, हम नहीं करना चाहते आपका अपमान
परन्तु हमारे ये पुत्र तो हैं हमारी जान !!
हम अपने प्राणों को नहीं दूर भेजना चाहते
क्यों न आप इन्हें शिक्षा देने महल में ही आ जाते !!
ऋषि बोले मेरा महल में न पढाने का है एक कारण
यह नहीं है धर्म, इसलिए ताकि मैं करू धरम पालन !!
मुझे इन्हें अपने संग ले जाना है
और अपना धर्म निभाना है !!
महारानियों ! आप की बात होती है हमेशा सही
तो कहिये, मैं अपना धर्म निभाऊ या नहीं !!
महरनिया बोली, गुरुवर, अब हमारे पुत्र है आपकी संपत्ति
परन्तु केवल कुछ दिन दें हमें उन्हें यहाँ रखने की अनुमति !!
ऋषिवर धर्म-वश नहीं माने उनकी बात
तीनो मताए सोचे, हाय ! कैसे कटेगी यह रात !!
ऋषिवर वशिष्ठ ने अपनी बात जब दशरथ को बताई
बोले राजा, हाय ! यह कैसी घडी है आई ?
मुझे प्रिय हैं मेरे ये पुत्र सारे
यह चारो हैं दुनिया के सबसे न्यारे !!
जो पुत्र है मुझे प्राणों से भी प्यारे
अब दूर हो जायेंगे मेरी आँखों के तारे !!
हंसते - खेलते बीते कुछ वर्ष
अयोध्या में हर तरफ छाया था हर्ष !!
पर एक दिन, जब सब दरबार दिए गए खोल
तब ऋषि ने श्रीमुख ये सब दिया बोल !!
महारानियों, बड़े हो गए है चारो राजकुमार
बस अब एक दिन और लुटायीए इन पर अपना प्यार !!
क्युकी फिर जाना है इनको गंगा पार
जहा गुरुकुल को है इनका इंतज़ार !!
यह सुन तीनो रानिया गयी वही थम
कहने लगी ऋषि से , मत दीजिये हमें ऐसा गम !!
ऋषि बोले यह तो है बड़ी पुरानी रीति
कौशल्या माँ बोली , हाय ! यह कैसी है रीति !!
ऋषि ने कहा गुरुकुल से मिलता है सबको ज्ञान
ज्ञान पाकर ही बनते है साधारण मनुष्य विद्वान !!
गुरुकुल में होती है एक गुरुमाता
जिनका बच्चो से होता है माँ का ही नाता !!
दिव्य और अलौकिक होती है वहां की ज़मी
नहीं होती वहां कभी किसी चीज़ व् प्यार की कमी !!
गुरुकुल में बिताने है इन्हें बस कुछ ही साल
ताकि वेद ज्ञान पा, खुद को पहचान जाए ये बाल !!
मुझे इन्हें गुरुकुल ले जाने की दे इजाज़त
अन्यथा, मैं अपने कर्तव्य से हो जाऊंगा पराजत !!
रनिया बोली, हम नहीं करना चाहते आपका अपमान
परन्तु हमारे ये पुत्र तो हैं हमारी जान !!
हम अपने प्राणों को नहीं दूर भेजना चाहते
क्यों न आप इन्हें शिक्षा देने महल में ही आ जाते !!
ऋषि बोले मेरा महल में न पढाने का है एक कारण
यह नहीं है धर्म, इसलिए ताकि मैं करू धरम पालन !!
मुझे इन्हें अपने संग ले जाना है
और अपना धर्म निभाना है !!
महारानियों ! आप की बात होती है हमेशा सही
तो कहिये, मैं अपना धर्म निभाऊ या नहीं !!
महरनिया बोली, गुरुवर, अब हमारे पुत्र है आपकी संपत्ति
परन्तु केवल कुछ दिन दें हमें उन्हें यहाँ रखने की अनुमति !!
ऋषिवर धर्म-वश नहीं माने उनकी बात
तीनो मताए सोचे, हाय ! कैसे कटेगी यह रात !!
ऋषिवर वशिष्ठ ने अपनी बात जब दशरथ को बताई
बोले राजा, हाय ! यह कैसी घडी है आई ?
मुझे प्रिय हैं मेरे ये पुत्र सारे
यह चारो हैं दुनिया के सबसे न्यारे !!
जो पुत्र है मुझे प्राणों से भी प्यारे
अब दूर हो जायेंगे मेरी आँखों के तारे !!
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