Loading...
Loading...

Monday, October 12, 2009

रामायण

बाल कांड
जनम पूर्व

भाग - १
राजा दशरथ थे चिंता में लेटे
सोच रहे थे मेरे नहीं हैं बेटे !1!

वह थे चिंता से बिलकुल मौन
' मेरे बाद अयोध्या पति बनेगा कौन' !२!

एक दिन आये ऋषि वशिष्ठ और सुझाव दिया एक
दूर गुफा में हैं ऋषि ऋंगी बड़े ही नेक !३!

उनसे करवाओ तुम पुत्रयेष्टि यज्ञ
ताकि अयोध्या की कीर्ति हो जाये सर्वज्ञ !४!

कुछ समय पश्चात् झूम उठी अयोध्या सारी,
और खिल गयी ढेरो फूलो की क्यारी !5!

राजन की थी तीन बीबिया प्यारी
कौशल्या, सुमित्रा और कैकयी सबसे दुलारी !6!

फलीभूत हुआ दिव्य यज्ञ जब
अयोध्या में खुशिया सर्वज्ञ हुई तब !7!

खुशियों की छा गयी बहार
देवो ने गाए मंगल चार !8!

उस दिन था बड़ा ही शुभवार
जब जन्म लिए विष्णु अवतार !9!

भाग - २ - जनम पश्चात् ...

अयोध्या नरेश को हुऐ चार बालक
कौशल्या, सुमित्रा और कैकयी थी जिनकी पालक !१०!

ऋषियों - मुनियों ने मंत्रो का किया उच्चारण
और शुरू हुआ बालको का नाम-करण !11!

कौशल्या नंदन का रखा गया नाम
जो की था पुरुषोत्तम राम !12!

ऋषिवर बोले ' यह है बड़ा तेजस्विवान'
मंथरा को छोड़ हर चेहरे पर छा गयी मुस्कान !13!

सुमत्रा को हुऐ थे दो बालक प्यारे
जो बने दशरथ की आँखों के तारे !14!

ऋषि ने किया अपना आगे का काम
लक्ष्मण और शत्रुघ्न रखे उनके नाम !15!

कैकयी पुत्र का रखा गया भरत नाम
प्रजा का भरण - पोषण निर्धारित हुआ उसका काम !16!

ऋषि जी बोले, यह बनेंगे विद्वान
अब मंथरा के चेहरे पर भी छाई मुस्कान !17!

भरत और राम का वर्ण था श्याम
और सबके लाडले बने श्री राम !18!

भाग - ३ - गुरुकुल

हंसते - खेलते बीते कुछ वर्ष
अयोध्या में हर तरफ छाया था हर्ष !19!

पर एक दिन, जब सब दरबार दिए गए खोल
तब ऋषि ने श्रीमुख ये सब दिया बोल !२०!

महारानियों, बड़े हो गए है चारो राजकुमार
बस अब एक दिन और लुटायीए इन पर अपना प्यार !21!

क्युकी फिर जाना है इनको गंगा पार
जहा गुरुकुल को है इनका इंतज़ार !22!

यह सुन तीनो रानिया गयी वही थम
कहने लगी ऋषि से , मत दीजिये हमें ऐसा गम !23!

ऋषि बोले यह तो है बड़ी पुरानी रीति
कौशल्या माँ बोली , हाय ! यह कैसी है रीति !24!

ऋषि ने कहा गुरुकुल से मिलता है सबको ज्ञान
ज्ञान पाकर ही बनते है साधारण मनुष्य विद्वान !25!

गुरुकुल में होती है एक गुरुमाता
जिनका बच्चो से होता है माँ का ही नाता !26!

दिव्य और अलौकिक होती है वहां की ज़मी
नहीं होती वहां कभी किसी चीज़ व् प्यार की कमी !27!

गुरुकुल में बिताने है इन्हें बस कुछ ही साल
ताकि वेद ज्ञान पा, खुद को पहचान जाए ये बाल !28!

मुझे इन्हें गुरुकुल ले जाने की दे इजाज़त
अन्यथा, मैं अपने कर्तव्य से हो जाऊंगा पराजत !28!

रनिया बोली, हम नहीं करना चाहते आपका अपमान
परन्तु हमारे ये पुत्र तो हैं हमारी जान !!

हम अपने प्राणों को नहीं दूर भेजना चाहते
क्यों न आप इन्हें शिक्षा देने महल में ही आ जाते !!

ऋषि बोले मेरा महल में न पढाने का है एक कारण
यह नहीं है धर्म, इसलिए ताकि मैं करू धरम पालन !!

मुझे इन्हें अपने संग ले जाना है
और अपना धर्म निभाना है !!

महारानियों ! आप की बात होती है हमेशा सही
तो कहिये, मैं अपना धर्म निभाऊ या नहीं !!

महरनिया बोली, गुरुवर, अब हमारे पुत्र है आपकी संपत्ति
परन्तु केवल कुछ दिन दें हमें उन्हें यहाँ रखने की अनुमति

ऋषिवर धर्म-वश नहीं माने उनकी बात
तीनो मताए सोचे, हाय ! कैसे कटेगी यह रात !!

ऋषिवर वशिष्ठ ने अपनी बात जब दशरथ को बताई
बोले राजा, हाय ! यह कैसी घडी है आई ?

मुझे प्रिय हैं मेरे ये पुत्र सारे
यह चारो हैं दुनिया के सबसे न्यारे !!

जो पुत्र है मुझे प्राणों से भी प्यारे
अब दूर हो जायेंगे मेरी आँखों के तारे !!

सीता जन्म

भाग - 3

उधर मिथिला के खेतो में जहा किसान खुशाली लाते थे
आज वहीँ राजा जनक प्रजा की खुशहाली के लिए हल चलते थे !!

कर रहे थे ऐसा वे, ले ऋषि का सुझाव नेक
जिसके अनुसार हल चला, पा सकते थे वह संतान एक

फिर धरती ने उगला सोना
चमक उठा धरती का हर कोना !!

बस तब तो था मिथिला में आनंद छाया
क्युकी राजा जनक ने एक कन्या को था पाया !!

वो तो थी धरती माँ की बेटी प्यारी
नाम रखा गया जिनका सीता सुकुमारी !!

जबसे पैदा हुई थी सिया रूप में लक्ष्मी अवतार
तबसे खुशिया मना रहा था मिथिला का हर परिवार !!

फिर पैदा हुई सीता की तीनो बहने, राज दुलारी
नाम थे जिनके उर्मिला, मांडवी और शुभकीर्ति कुमारी !!

एक बड़ा ही शुभवार आया था
मिथिला में उल्लास छाया था !!

पर वहा अयोध्या नगरी में
राजा दशरथ की राज नगरी में. !!

गुरुकुल - ३

कर रहे थे चारो राजकुमार गुरुकुल को प्रस्थान
सुमंत महा मंत्री ले जा रहे थे उनका सामन

तीनो माओ की आँखों से था जहर जहर बह रहा नीर
राजा दशरथ रामभवन में हुऐ जा रहे थे अधीर !!

वहा आश्रम में गुरुमाता को भी था कुमारो का इन्तज़ार
आश्रम सीमा में उनके आगमन का मिलते ही समाचार !!

गुरुमाता गयी उन्हें लिवाने गुरुकुल के द्वार
और उनका स्वागत कर, दिया माँ का सा प्यार !!

क्युकी वह जानती थी की प्रिय राम हैं विष्णु अवतार
सो वह करने लगी नैनो से स्नेह, ममता की बौछार !!

आश्रम में कुमारो के आने से एक अलग महक थी छाई
पेड - पौधों, पशु - पक्षियों व् वन जीवो ने स्वागत में मधुर वीणा बजायी !!

प्रतिदिन गुरुकुल में गुरुमा ने उन्हें अपने हाथ से खाना खिलाया
और घर से दूर होने के दुःख से राजकुमारो को मुक्त कराया !!

गुरु से वेद ज्ञान पते हुऐ बीते कई साल
और शिक्षा पते हुए बड़े हुए सब बाल !!

बनकर ज्ञानवान युवक, सीख गए थे चारो करना परोपकार
तो स्वयं आई वेज घडी जिसका अयोध्यावासी कर रहे थे इंतज़ार !!

चारो कुमार कर के गंगा पार
लौट आये अयोध्या, जहा सबकी था उन्ही का इंतज़ार !!

अयोध्या में फिर एक बार आनंद छाया था
सबका लाडला राम बंधुओ सहित घर आया था !!


भाग - ७ - बालको की वापसी


उस दिन अयोध्या में खूब खुशिया थी छाई
सुन पुत्रो के आने का समाचार, महरनिया फूली न समायी !!

अयोध्या पहुँच गए चारो कुमार, बहुत प्रसन्न थे राम
अयोध्यावासियों को स्वागत में देख कर करा उन्हें प्रणाम !!

इस ख़ुशी के अवसर पर मच गया हर तरफ शोर
महल में आते ही गए वह राज भवन की ओर !!

आते ही किया राजा दशरथ को प्रणाम
प्रसन्न चित हो बोले राजा आ गया मेरा राम !!

गए फिर मिलने तीनो रानियों से उनके बाल
बिन तुम्हारे कैसे बीते यह साल

तुम चारो हो बड़े ही प्यारे
हो तुम हमारी आँखों के तारे !!

सबमे मुझे राम है सबसे दुलारे
लेकिन तब भी हो लाडले मुझे तुम सारे !!

बस हर रात आते थे हमको ख्वाब तुम्हारे
अब कभी दूर न होने देंगे हम यह पुत्र न्यारे !!

बोली मताए पुत्रो से हे पुत्र वीरो
फिर हमें कभी छोड़ना मत, हमारे हीरो !!

चारो राजकुमार थे यकीनन बड़े वीर
पर माँ की ममता देख आँखों से बहने लगे नीर !!

भाग - ८ , विश्वामित्र अयोध्या में

परन्तु फिर केवल कुछ ही दिनों में दुःख छा गए
जैसे ही ऋषि विश्वामित्र अयोध्या आ गए

राजा दशरथ पुत्रो के साथ हंस गा रहे थे
तब जब ऋषि विश्वामित्र अयोध्या में आ रहे थे !!

माँ कैकयी की गोद में लेटे थे राम
महसूस कर रहे थे एक बार फिर स्वर्ग सा आराम !!

कुछ ही देर में महल में ऋषि जी आये
बोले कष्ट कर सुमंत जी, जरा दशरथ जी को बुलाये !!

सुमंत ने कहा दशरथ से , आपको ऋषिवर ने है बुलाया
दशरथ बोले तुम जाओ मैं अभी आया !!

जल का लोटा हाथ ले, राजा दशरथ पधारे राज भवन
जहा विश्वामित्र जी के आगमन से वातावरण हुआ था पवन !!

राजा दशरथ जभी धो रहे थे ऋषिवर के शुभ चरण
तभी उन्हें एक दिव्य कथा का होने लगा स्मरण !!

कथा की कैसे विश्वामित्र बन गए थे संत
और कैसे उनके मोह का हुआ था अंत !!

विश्वामित्र अयोध्या में -

दशरथ बोले आपकी आज्ञा हो तो पुत्रो को भी बुलाऊ
और अपनी दिव्य वाणी का प्रेम व् आशीर्वाद उन्हें दिल्वाऊ

ऋषिवर की आज्ञा पा चारो कुमार वहा आये
सबके प्रिय राम को देख ऋषिवर मन ही मन मुस्काए

फिर राजा दशरथ ने चारो के परिचय कराये
राम के स्वरुप में ऋषि को विष्णु नज़र आये !!

फिर राजा दशरथ से प्रसन्नता ज़ाहिर करी एक
की उनका पुत्र राम है तेजस्वी और नेक !!

और अपना दुखडा कह सुनाया
अपने अयोध्या आने का कारण बतलाया !!

जैसे ही हम दिव्य यज्ञ में आहुति डालते है
वैसे ही सुबाहु और मारीच राक्षस हमें ललकारते है !!

आकार वह इस यज्ञ में विघ्न हमेशा डालते है
इस कारण सब ऋषि यज्ञ सामग्री को सँभालते है !!

हम चाहते है की वह दोनों राक्षस न हमें तडपाये
तो क्या हम अपने यज्ञ की रक्षा के लिए राम को ले जाए !!

राजा दशरथ की सहर्ष आज्ञा पा राम - लक्ष्मण हुऐ तैयार
चल पड़े संग ऋषि विश्वामित्र के, छोड़ अपना परिवार !!

ताड़का वध

मार्ग में ऋषि ने राम को युद्घ विद्या समझाई
चलते हुऐ मार्ग में फिर सरयू नगरी आई !!

सरयू नगरी थी हमेशा से ही बहुत वीरान
रहती थी वहा ताड़का, करती सबको परेशान !!

ताड़का जो थी मायावी राक्षस मारीच की माता
उसे ना था कोई दिव्य कर्म, यज्ञ आदि भाता !!

जब ऋषिवर ने रामम को ताड़का के कुकर्म का परिचय करवाया
तो तुंरत ही ताड़का वध का राम ने संकल्प उठाया !!

श्री राम की धनुष टंकार से मच गया हर तरफ शोर
भड़क उठी राख्श्सी ताड़का और युद्घ हुआ घनघोर !!

राम ने थी ताड़का पर जल्दी ही विजय पाई
इस पर ऋषि विश्वामित्र ने दी उन्हें बधाई !!

प्रभु राम के दिव्य अस्त्रों से होता है जिसका भी संहार
पा लेता वह मोक्ष, निश्चित है उसका उदगार !!

यज्ञ पूर्ती - १

राज कुमारो ने ऋषि संग वन में रात बितायी
अगले दिन प्रातः ऋषि ने उन्हें अस्त्र विद्या सिखलाई !!

तत्पश्चात वे राजकुमारों को अपने आश्रम में ले आये
कुछ दिन राम-लखन ने ऋषि आश्रम की रक्षा में बिताये !!

सुबाहु और मारीच जिन्हें विश्वामित्र सदा ही सहते थे
वह दोनों दैत्य ऋषि आश्रम के समीप ही रहते थे !!

राम-लखन ने थे बड़े ही नेक कर्म किये
सो ऋषि मुनियों ने उन्हें ढेरो आशीष दिए !!

अगले दिन प्रातः पुनः हवन सामग्री लायी गयी
और मंत्रोच्चारण के बीच शुभ अग्नि जलाई गयी !!

परन्तु यह क्या ? आश्रम में हर तरफ अँधेरा छा गया
सुबाहु, मारीच संग दैत्य सेना लिए आ गया !!

जैसे ही तपस्या ऋषियों ने प्रारंभ करी
दैत्य सेना रक्त की नदिया बहाने लपट पड़ी !!

उन्होंने गर यज्ञ में विघ्न डालनी चाही थी
तो यज्ञ रक्षा करनी की प्रभू राम ने भी तो कसम खायी थी !!

दिव्य अग्नि में गाय शीर्ष गिराने दैत्य मारीच आया
क्रोध में आकर श्री राम ने मानव अस्त्र चलाया !!

मानव अस्त्र के लगते ही उसका बुरा विचार मिट गया
और वह दूर समुद्र तट पे जा गिर गया !!

फिर प्रभू राम ने सुबाहु पर किया प्रहार
आग्नेय अस्त्र की मदद से राम ने सब मार गिराए !!

यज्ञ में विघ्न डालने अन्य दैत्य जब आये
वायव्य अस्त्र की मदद से राम ने सब मार गिराए !!

सम्पूर्ण हुआ वह दिव्य यज्ञ और
श्री राम की कीर्ति हुई आश्रम में सर्वज्ञ !!

विश्वामित्र ने राम जी को दी बधाई
की उन्होंने ऋषियों की नैया पार लगायी !!

ऋषिवर ने पूछा राम से मांगो क्या वरदान तुम्हे चाहिए
राम आदर से बोले कृपया आप मेरे गुरु बन स्वयं ही बताइए !!

दोनों भाइयो से प्रसन्न हो ऋषि ने दिया उन्हें वरदान
खली न होगा तुम्हारा तरकश, ख़त्म ना होंगे तुम्हारे बाण !!

अभिभूत होकर राम-लखन ने लिया गुरु का आशीर्वाद
यज्ञ अग्नि को प्रणाम कर दोनों ने पिया यज्ञ प्रसाद !!

सीता स्वयंवर की तैयारिया

उधर मिथिला नगरी मे
राजा जनक की राज नगरी मे

सयानी हो गयी थी चारो बहने
वह तो थी जैसे मिथिला के गहने

राजा जनक ने अपने मन मे किया कुछ विचार
कुछ दिवस बाद ही आयेगा बहुत ही शुभवार !!

बडी हो गयी है मेरी प्रिये सुपुत्री सीता
तो उस दिन मै क्यू न उसका विवाह ही कर देता !!

पर सिया राजकुमारी का विवाह किसी वीर कुवर से करुंगा
और सबसे बलशाली चुनने को स्वयंवर मै रचुंगा !!

मै महमांनो को शिव धनुष उठाने को बोलुंगा
और फिर उस पर प्रत्यंचा भी चढाने को कहुंगा !!

जो होगा इसमे सफल मेरी पुत्री विवाह उसी से करेगी
और अपने वीर पती संग सुखी जीवन भर वह रहेगी !!

यह सोच जनक ने विभिन्न राज्यो को भेजा समाचार
और लगे वे सोचने, आयेंगे कयी वीर राजकुमार !!

सिया स्वयंवर की खबर सुन तीनो बहने फुली ना समाई
जान यह समाचार सिया कुमारी भी शर्मायी !!

मिथिला की तैय्यारी

सभी राक्षसो को मार कर प्रसन्न थे दोनो कुमार
रात्री मे निश्चित हो सोये सब ऋषि और राजकुमार !!

प्रातः हुई तो उठे वे लेकर प्रभू का नाम
घर जाने का सोच कर बडे खुश थे राम !!

उठ कर के करने लगे दोनो ऋषि की सेवा
श्रद्धा भाव से बोले, राम, ऋषि आपमे दिखते है हमे कयी देवा

तत्पश्चात आज्ञा मांगी क्या हम अब लौटें अपने घर
ऋषि बोले क्या जल्दी है, हमे निहारने दे आप जी भर !!

तभी मिथिला नगरी से ऋषि वर को संदेशा आया
राजा जनक ने सीता स्वयंवर मे था सादर उन्हे बुलाया !!

ऋषि ने फिर कुमारो को शिव धनुष का था बताया
बोले वह है इतना भारी, उसे कोई नही है उठा पाया !!

राम-लखन को साथ ले ऋषि चले मिथिला की ओर
मार्ग मे मिले उन्हे कयी सुंदर सुंदर मोर !!

बार बार ऋषि विश्वामित्र देते थे राम को बधाई
मार्ग मे ऋषि ने उन्हे समुद्र मंथन की थी कथा सुनाई !!

गंगा किनारे राम लखन को दी कुटी एक दिखाई
ऋषि ने विस्तार से उन्हे उसकी कथा सुनाई !!

आगे क्या होगा, जानने से पेहले लो एक नाम
जोर से मिलकर सारे बोलो जय जय श्री राम !!

अहिल्या माँ की कथा और मोक्ष प्राप्ति

कुछ वर्ष पहले यहाँ रहते थे गौतम ऋषि
उनकी भार्या अहिल्या सदा देती थी उन्हें ख़ुशी

अहिल्या, सौंदर्ये की देवी, करती थी सोलह श्रृंगार
उनकी अनुपम सुन्दरता थी ऋषि गौतम को उपहार !!

एक प्रातः ऋषि गए स्नान करने जब गंगा की ओर
अपनी पतिव्रता भार्या को कुटिया में अकेला छोड़ !!

तब वायु मार्ग से गुज़र रहे थे इन्द्र भगवान
और अति सुन्दर अहिल्या देवी पर गया ध्यान !!

सुंदर देवी देख हो गए उन पर मुग्ध
और उन्हें पाने का वह करने लगे कुछ युक्त !!

इन्द्र देव ने धारण करा ऋषि गौतम का रूप
क्युकी उन्हें था भा गया अहिल्या जी का स्वरुप !!

जैसे ही सूरज को ढकते बादल छा गए
वैसे ही इन्द्र देव गौतम ऋषि का रूप धर आश्रम में आ गए !!

आते ही वह अहिल्या देवी से करने लगे बात
और प्रकृति की छटा निहारने लगे वह बैठ एक साथ !!

अहिल्या माँ बैठी थी फैलाये अपने केश
और तभी हुआ ऋषि गौतम का आश्रम में प्रवेश !!

जब ऋषि ने अहिल्ये जी को किसी और संग पाया
गुस्से से भड़के और बोले ' दुष्ट कौन है तू और यहाँ कैसे आया ' !!

दो - दो ऋषि स्वामी देख कर अहिल्या को अनिष्ट ने सताया
आश्चर्ये में वह पड़ गयी , कौन है अपना, कौन पराया !!

क्षमा मांगने के लिए इन्द्र ने अपना रूप किया धारण
पर ऋषि गौतम ने दे दिया श्राप बिना सुने ही कारण !!

माँ अहिल्या को श्राप दिया, बन जाए वह पाषाण
शिला बन गयी देवी अहिल्या, हर तरफ आ गया तूफ़ान !!

जब से अहिल्या माँ थी शिला बन गयी
तब से यहाँ की भूमि थी सूनी हो गयी !!

इस कथा का विश्वामित्र ने श्रवण कराया
और अहिल्या माँ का पाषाण रूप राम को था दिखाया !!

ऋषि बोले, जाओ राम, शिला को श्री चरण अपने लगाओ
और देवी अहिल्या को कटु श्राप से तुंरत मुक्त कराओ !!

सुन यह बात श्री राम ने अपना कदम बढाया
और शिला रूप अहिल्या पर अपना चरण लगाया !!

ऐसा करते ही श्राप मुक्त हुई अहिल्या माता
मानने लगी श्री राम को वह अपना भाग्य विधाता !!

शिव धनुष

विश्वामित्र के आने का संदेसा जैसे ही जनक जी ने पाया
फूलो के पथ पर उन्हें महल के भीतर बुलाया !!

ऋषिवर ने राजा जनक को राम - लखन से मिलवाया
राम जी के तेज़स्वी रूप और साहस का बोध कराया !!

ऋषि ने बताया कैसे राम ने ताड़का और सुबाहु को मारा था
और कैसे दैत्य मारीच भी युद्घ में श्री राम से हारा था !!

ऋषि ने फिर राम जी को शिव धनुष भी दिखाया
बोले इस दिव्य धनुष को अब तक कोई नहीं है उठा पाया !!

राजा जनक के पूर्वजों को शिव जी ने यह दिया था
जनक पूर्वजों ने भी इसे इज्ज़त से स्वीकार किया था !!

सीता स्वयंवर में राजकुमारों को इस पर प्रत्यंचा चढानी है
भाग कई वीर लेंगे, क्युकी उन्हें सीता पानी है !!

कमल-लोचन, सुन्दर कन्या है सीता राजकुमारी
पहली नज़र में ही उन पर हो सकता है कोई बलिहारी !!

राम तुम इस स्वयम्वर में भाग जरूर ही लेना
तुम कितने बलवान हो सृष्टि को दिखा देना !!

कुछ ही दिनों में शुरू हुआ सीता कुमारी का स्वयंवर
उल्लास से भर उठा मिथिला का हर घर !!

स्वयंवर में सीता

राजा जनक बहुत प्रसन्न थे महल सजावट के काम में
उन्होंने प्रारंभ करा स्वयंवर धूम-धाम से !!

स्वर्ण आभूश्नो से सजी सिया कुमारी आई
सजे सवरे वीर राजकुमारों को देख वे थोडा सुकुचायी !!

लक्ष्मी अवतार सिया को जब विष्णु रूप राम दिए दिखाई
उन्हें प्रेम मुग्ध हो निहारने वह स्वयंवर भवन में आई !!

स्वयंवर की फिर हुई शुरुआत
श्री राम देने वाले थे सबको मात !!

शिव धनुष पर प्रत्यंचा चढाने कई राजकुमार आये
पर हाय रे ! वह तो धनुष को तनिक हिला भी ना पाए !!

सभी वीर कुमारो ने धनुष उठाने का किया भरसक प्रयास
पर सुन्दरी सीता को थी बस प्रभू श्री राम की आस !!

सिया कुमारी करने लगी प्रार्थना भगवान से
की शिव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़े तो सिर्फ श्री राम से !!

जब भरी सभा में कोई भी धनुष उठा ना पाए
'क्या किसी में बल नहीं' राजा जनक क्रोध से चिल्लाये !!

सिये सुन्दरी ने प्रभू राम की ओर जब विनीत नयन उठाये
तब गुरु आज्ञा पा श्री राम धनुष उठाने आये !!

क्या राम शिव धनुष को उठा पाएंगे ?
अब अगले पाठ में हम सब यह जान जायेंगे !!

2 comments:

Raviratlami said...

राघव,
आप छठीं कक्षा के छात्र हैं और आपकी क्षमता विस्मित करती है. आपकी भाषा अच्छी तो है ही, आप टाइप भी बढ़िया कर लेते हैं. अपने हिन्दी कम्प्यूटिंग कैसे और किस तरह से सीखी और हिन्दी ब्लॉग कैसे बनाया ये कहानी हम सब को बांटें तो मजा आए...

sangeeta said...

राघव,
बहुत सुन्दर भाषा और बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति...योग्यता उम्र से अधिक...

बहुत बहुत बधाई..जीवन में आप बहुत आगे बढ़ें..शुभकामनायें