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Friday, November 6, 2009

यज्ञ पूर्ती

यज्ञ पूर्ती - १

राज कुमारो ने ऋषि संग वन में रात बितायी
अगले दिन प्रातः ऋषि ने उन्हें अस्त्र विद्या सिखलाई !!

तत्पश्चात वे राजकुमारों को अपने आश्रम में ले आये
कुछ दिन राम-लखन ने ऋषि आश्रम की रक्षा में बिताये !!

सुबाहु और मारीच जिन्हें विश्वामित्र सदा ही सहते थे
वह दोनों दैत्य ऋषि आश्रम के समीप ही रहते थे !!

राम-लखन ने थे बड़े ही नेक कर्म किये
सो ऋषि मुनियों ने उन्हें ढेरो आशीष दिए !!

अगले दिन प्रातः पुनः हवन सामग्री लायी गयी
और मंत्रोच्चारण के बीच शुभ अग्नि जलाई गयी !!

परन्तु यह क्या ? आश्रम में हर तरफ अँधेरा छा गया
सुबाहु, मारीच संग दैत्य सेना लिए आ गया !!

जैसे ही तपस्या ऋषियों ने प्रारंभ करी
दैत्य सेना रक्त की नदिया बहाने लपट पड़ी !!

उन्होंने गर यज्ञ में विघ्न डालनी चाही थी
तो यज्ञ रक्षा करने की प्रभू राम ने भी तो कसम खायी थी !!

दिव्य अग्नि में गाय शीर्ष गिराने दैत्य मारीच आया
क्रोध में आकर श्री राम ने मानव अस्त्र चलाया !!

मानव अस्त्र के लगते ही उसका बुरा विचार मिट गया
और वह दूर समुद्र तट पे जा गिर गया !!

फिर प्रभू राम ने सुबाहु पर किया प्रहार
आग्नेय अस्त्र की मदद से राम ने सब मार गिराए !!

यज्ञ में विघ्न डालने अन्य दैत्य जब आये
वायव्य अस्त्र की मदद से राम ने सब मार गिराए !!

सम्पूर्ण हुआ वह दिव्य यज्ञ और
श्री राम की कीर्ति हुई आश्रम में सर्वज्ञ !!

विश्वामित्र ने राम जी को दी बधाई
की उन्होंने ऋषियों की नैया पार लगायी !!

ऋषिवर ने पूछा राम से मांगो क्या वरदान तुम्हे चाहिए
राम आदर से बोले कृपया आप मेरे गुरु बन स्वयं ही बताइए !!

दोनों भाइयो से प्रसन्न हो ऋषि ने दिया उन्हें वरदान
खली न होगा तुम्हारा तरकश, ख़त्म ना होंगे तुम्हारे बाण !!

अभिभूत होकर राम-लखन ने लिया गुरु का आशीर्वाद
यज्ञ अग्नि को प्रणाम कर दोनों ने पिया यज्ञ प्रसाद !!

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