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Wednesday, November 4, 2009

गुरुकुल

गुरुकुल

कर रहे थे चारो राजकुमार गुरुकुल को प्रस्थान
सुमंत महा मंत्री ले जा रहे थे उनका सामान

तीनो माओं की आँखों से था जार-जार बह रहा नीर
राजा दशरथ रामभवन में हुऐ जा रहे थे अधीर !!

वहा आश्रम में गुरुमाता को भी था कुमारो का इन्तज़ार
आश्रम सीमा में उनके आगमन का मिलते ही समाचार !!

गुरुमाता गयी उन्हें लिवाने गुरुकुल के द्वार
और उनका स्वागत कर, दिया माँ का सा प्यार !!

क्युकी वह जानती थी की प्रिय राम हैं विष्णु अवतार
सो वह करने लगी नैनो से स्नेह, ममता की बौछार !!

आश्रम में कुमारो के आने से एक अलग महक थी छाई
पेड - पौधों, पशु - पक्षियों व् वन जीवो ने स्वागत में मधुर वीणा बजायी !!

प्रतिदिन गुरुकुल में गुरुमा ने उन्हें अपने हाथ से खाना खिलाया
और घर से दूर होने के दुःख से राजकुमारो को मुक्त कराया !!

गुरु से वेद ज्ञान पाते हुऐ बीते कई साल
और शिक्षा पाते हुए बड़े हुए सब बाल !!

बनकर ज्ञानवान युवक, सीख गए थे चारो करना परोपकार
तो स्वयं आई वह घडी जिसका अयोध्यावासी कर रहे थे इंतज़ार !!

चारो कुमार कर के गंगा पार
लौट आये अयोध्या, जहा सबको था उन्ही का इंतज़ार !!

अयोध्या में फिर एक बार आनंद छाया था
सबका लाडला राम बंधुओ सहित घर आया था !!

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